रायपुर डिफेंस अकादमी विवाद: विश्वविद्यालय परिसर में युवाओं के साथ अनुशासन या उत्पीड़न?
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रायपुर। राजधानी रायपुर स्थित पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के परिसर में संचालित Pawar Defence Academy को लेकर इन दिनों स्थानीय स्तर पर गहन चर्चाएं हो रही हैं। पास-पड़ोस के रहवासियों, छात्रों, और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा उठाए जा रहे सवालों ने इस संस्था की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
सोशल मीडिया और स्थानीय फीडबैक के अनुसार, संस्था में युवकों और युवतियों के साथ कठोर और अपमानजनक व्यवहार, अनुशासन के नाम पर शारीरिक व मानसिक दबाव, तथा संदिग्ध संवादों की घटनाएं सामने आ रही हैं। ये घटनाएं सार्वजनिक रूप से चर्चा का विषय बन चुकी हैं, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब मुश्किल होता जा रहा है।
“प्रशिक्षण” या “प्रदर्शन” — युवाओं की गरिमा पर सवाल
कुछ वायरल पोस्ट्स और स्थानीय नागरिकों की प्रतिक्रिया में यह आरोप लगाए गए हैं कि संस्था में कथित रूप से गाली-गलौज और मारपीट को अनुशासन का हिस्सा बताया जाता है। एक कथित घटना में छात्रा को “काम निकालने” के लिए अप्रत्यक्ष रूप से कुछ देने की सलाह दी गई। यह संकेत कई लोगों को बेहद असहज करने वाला और अनुचित प्रतीत हुआ।
वाहन पर “Ex-Army” और “संगठन मंत्री” की पहचान — नियमों की अनदेखी?
स्थानीय नागरिकों ने एक चार-चक्के वाहन (CG07CD3268) की फोटो साझा की है, जिस पर “Ex-Army”, “प्रदेश संगठन मंत्री – Ex-Army Foundation” जैसे शब्द प्रमुखता से लिखे हैं। इन शब्दों का प्रयोग किस आधिकारिक अनुमति से हो रहा है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। यह भी पूछा जा रहा है कि क्या इस तरह की पहचान नियमों के विरुद्ध तो नहीं?
विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी — लापरवाही या अनदेखा समर्थन?
यदि यह संस्था विश्वविद्यालय परिसर में संचालित हो रही है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इसकी अनुमति किस आधार पर दी गई है। यदि प्रशासन अनभिज्ञ है तो यह लापरवाही है, और यदि जानकारी होते हुए भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा, तो यह और भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता — अब तक कोई जांच क्यों नहीं?
स्थानीय निवासियों का यह भी कहना है कि इतनी चर्चाओं और सोशल मीडिया पोस्ट्स के बाद भी अब तक न पुलिस विभाग की ओर से कोई आधिकारिक जांच प्रारंभ की गई है, न ही कोई प्रेस स्टेटमेंट जारी हुआ है। सवाल उठता है कि क्या प्रशासन केवल तब हरकत में आता है जब हालात हाथ से निकल जाएं?
सार्वजनिक मांगें जो अब अनदेखी नहीं की जा सकतीं:
विश्वविद्यालय और पुलिस प्रशासन द्वारा संयुक्त जांच शुरू की जाए।
संस्था की वैधानिक स्थिति, अनुमति और प्रशिक्षकों की पृष्ठभूमि की पड़ताल हो।
वर्तमान व पूर्व छात्रों से गोपनीय तरीके से बयान लिए जाएं।
संपूर्ण जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और कार्रवाई की समयसीमा घोषित की जाए।

निष्कर्ष:
यह विवाद सिर्फ एक संस्था तक सीमित नहीं है। यह एक गहरे और व्यापक सवाल को जन्म देता है — क्या युवाओं को सशक्त बनाने की प्रक्रिया में उनकी गरिमा, मानसिक सुरक्षा और अधिकारों की बलि दी जा सकती है?
इस विषय पर MPT न्यूज़ को जो भी जानकारी मिली है, वह स्थानीय नागरिकों, प्रतिनिधियों और संबंधित सामाजिक तत्वों की बातों व प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। समाचार केवल समाज में उठते सवालों को स्वर देने का प्रयास है, किसी संस्था या व्यक्ति को दोषी सिद्ध करने का माध्यम नहीं।
(MPT न्यूज़ जिम्मेदारी के साथ यह स्पष्ट करता है कि यह रिपोर्ट प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित नहीं है, बल्कि विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी और स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं का संपादित एवं संतुलित रूप है।)
