खाकी वर्दी में जिम्मेदारी, मंच पर पंडवानी की गूंज: आरपीएफ इंस्पेक्टर तरुणा साहू की अनोखी पहचान

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छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को नई पहचान दिलाने वाली तरुणा साहू की कहानी कर्तव्य और कला के अनूठे संगम की मिसाल है। वे एक ओर रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) में महिला इंस्पेक्टर के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं, तो दूसरी ओर मंच पर उतरकर महाभारत की कथाओं को पंडवानी गायन के माध्यम से जीवंत करती हैं। खाकी वर्दी और लोककला के प्रति उनका समर्पण उन्हें अलग पहचान दिलाता है।

तरुणा साहू पंडवानी की महान कलाकार और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई की शिष्या हैं। उन्होंने तीजन बाई के मार्गदर्शन में इस पारंपरिक कला की बारीकियां सीखीं। पंडवानी के प्रति उनका लगाव बचपन से ही रहा है। बताया जाता है कि उन्होंने लगभग 9 से 10 वर्ष की उम्र में ही गायन शुरू कर दिया था। उस समय वे रायपुर के माना कैंप स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में पढ़ाई कर रही थीं। बचपन में शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

तरुणा साहू पंडवानी की कपालिक शैली में प्रस्तुतियां देती हैं। इस शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय, संवाद और गायन के जरिए महाभारत के प्रसंगों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। इसमें कलाकार अपनी आवाज, भाव-भंगिमाओं और पारंपरिक वाद्य के सहारे कथा को श्रोताओं के सामने सजीव कर देता है। तरुणा की प्रस्तुतियों में भी यही ऊर्जा और भावनात्मक जुड़ाव दिखाई देता है। विशेष रूप से महाभारत के द्रौपदी चीरहरण जैसे प्रसंगों का गायन करते समय वे भावुक हो जाती हैं।

पेशेवर जीवन में तरुणा साहू रेलवे सुरक्षा बल में इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। पुलिस सेवा की जिम्मेदारियों और व्यस्त दिनचर्या के बावजूद वे अपनी लोककला के लिए समय निकालती हैं। उनके जीवन में परिवार भी पुलिस सेवा से जुड़ा है। उनके पति एमन साहू छत्तीसगढ़ पुलिस में थाना प्रभारी के पद पर कार्यरत बताए जाते हैं। इस तरह परिवार और सेवा की जिम्मेदारियों के बीच वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं।

तरुणा साहू ने दिल्ली के राष्ट्रीय मंचों के साथ अयोध्या महोत्सव, भोरमदेव महोत्सव, चक्रधर समारोह और छत्तीसगढ़ राज्योत्सव जैसे प्रतिष्ठित आयोजनों में पंडवानी की प्रस्तुतियां दी हैं। इन मंचों के माध्यम से उन्होंने प्रदेश की पारंपरिक लोककला को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया है। उनकी प्रस्तुतियां यह भी बताती हैं कि लोककलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण जरिया हैं।

तरुणा साहू की यात्रा उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो अपनी नौकरी और व्यक्तिगत रुचियों के बीच संतुलन बनाकर अपने सपनों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। वे अपनी वर्दी के जरिए सुरक्षा और सेवा का दायित्व निभाती हैं, वहीं पंडवानी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को जीवित रखने में योगदान दे रही हैं। उनका सफर साबित करता है कि समर्पण और लगन के साथ जिम्मेदारियों के बीच भी अपनी कला और परंपरा के लिए जगह बनाई जा सकती है।

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