नक्सली साए से मुक्त हुआ कुतुल, 78 साल बाद पहली बार तिरंगा फहराया | Independence Day 2025
Photo Courtesy @ ITBP_ official
नारायणपुर, 15 अगस्त 2025 — नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र का ग्राम कुतुल लंबे समय तक नक्सली दहशत के कारण अघोषित नक्सली राजधानी के रूप में जाना जाता था। स्वतंत्रता के 78 साल बाद भी इस गांव के लोग राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा फहराने से डरते थे। पर 15 अगस्त 2025 को कुतुल ने इतिहास रचा और पहली बार शान से तिरंगा फहराया। इस दिन गांव की गलियों में डर नहीं, बल्कि देशभक्ति की आवाज़ और राष्ट्रगान की गूंज सुनाई दी।
नक्सली दंश से मुक्ति और विकास की शुरुआत
कुतुल गांव अबूझमाड़ के दुर्गम जंगलों में स्थित है, जहां वर्षों तक नक्सली प्रभाव रहा। यहां पुलिस की पहुंच मुश्किल थी और विकास कार्य नगण्य थे। नक्सलियों के दबाव के कारण स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराना खतरनाक साबित होता। 7 फरवरी 2025 को पुलिस कैंप स्थापित होने के बाद धीरे-धीरे बदलाव की शुरुआत हुई। पक्की सड़कें बनीं, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाओं में सुधार हुआ, और गांव में सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ हुई। इसी दौरान क्षेत्र के कुख्यात नक्सली ‘अरब’ ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। इसके बाद कई अन्य नक्सलियों ने भी हथियार डाल दिए, जिससे पूरे इलाके में शांति का माहौल बना।
इतिहासिक स्वतंत्रता दिवस समारोह
15 अगस्त की सुबह बच्चों ने अपने हाथों में तिरंगा थामा और आश्रम शाला से पुलिस कैंप तक प्रभात फेरी निकाली। उनके राष्ट्रप्रेम से भरे गीत गांव में गूंज उठे। कैंप में आईटीबीपी कमांडेंट ने ध्वजारोहण किया और जवानों ने सलामी दी। बारिश की बूंदों के बीच पुरुष और महिलाएं पारंपरिक आदिवासी पोशाक पहनकर मांदरी नृत्य करते हुए समारोह में शामिल हुए।
ग्रामीणों की भावनाएं और बदलता माहौल
गांव के शिक्षक सुखचंद मंडावी ने कहा, “असल मायनों में हमें आज़ादी छह महीने पहले मिली, जब पुलिस कैंप यहां आया और शांति स्थापित हुई। उसके बाद ही विकास कार्य शुरू हुए।” ग्रामीणों ने भी माना कि पहले नक्सली डर के कारण तिरंगा फहराना नामुमकिन था, लेकिन अब माहौल पूरी तरह बदल चुका है।
कुतुल में तिरंगा फहराने की यह घटना केवल इस गांव तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे अबूझमाड़ और बस्तर क्षेत्र के लिए प्रेरणा है। यह दिखाती है कि जब सुरक्षा, विकास और भरोसा साथ आएं, तो सबसे गहरे अंधेरे में भी उजाले की किरण पहुंच सकती है। कुतुल में फहराया गया तिरंगा केवल आज़ादी का प्रतीक नहीं, बल्कि नक्सलवाद के अंत और विकास की नई सुबह का संदेश भी है।
