उसने कहा –
वैसे तो कौन है, जिसे नहीं आता रोना-गाना,
पर आपके पास खास भेजा है
मैं हँसने लगा
असली रोना क्या मेरी बपौती है
वचन न जाई जैसा
मेरे पास कुछ भी तो नहीं है
अँधेरे में सब कुछ हो रहा है।
रोशनी में तो इतनी जल्दी
कि देख पाना भी लगभग
मुश्किल के बीच टूटने लगता है
चीजों में अँधेरा है या घुप्प के भीतर
बिछा है सब कुछ फिर भी आए हो
तो पुलिस के बारे में सुनो ध्यान से
जब मैंने कहा तो वह
गरदन खुजलाते हुए ढूँढने लगा
पर मच्छर उड़ गया था और वह
नमस्कार के बाद की स्थिति में
दरवाजा देखने लगा
मैंने कहा जाओ और
फुरसत के दिन आना पर भूलकर
कि असली गाना सिर्फ मुझे ही आता है
और वह इस बातचीत के बारे में किसी से न कहें
कहता हुआ चला गया…
मैं सोच में टटोलने लगा गर
वह राजी हो जाता तो पुलिस के बारे में
मेरे पास नया था बताने को
सिवा वर्दी के विवरण और
उन सवालों के जिनके जवाब
कुछ बख्तरबंद गाड़ियों के साथ
हमेशा के लिए नष्ट हो गए हैं
ले देकर एक रोजनामचा बचा है
जो पैतृक कब्जियत के शिकार
मुंशी की कोहनी को सहते सहते
तहखाने की प्रतीक्षा बन गया है
सुराग को धूप के चश्में की तरह
आँखों पर चढ़ाकर वे लोग जा रहे हैं
सूरज के ठीक नीचे घटनाओं की भिड़न्त जारी रखकर,
राहत के नाम पर देखने को ग़ायब करते हुए
दुबारा यदि आएगा तो पुलिस नहीं
उनके बच्चों के बारे में बताऊँगा
जिनकी आँखों में उजाले जैसे ज़रा भी नहीं है
एक साबुत स्लेट और सफ़ेद कमीज़ के इंतजार में
जो बरसों से वन्देमातरम् के विरूद्ध
कुछ गा रहे है……….
