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देख तो लेते हैं पर वो जताते नहीं हैं
हाथ भी खुद होकर मिलाते नहीं हैं

इस क़दर अकड़ है गर्दन में उनकी
कोई गिर जाए तो भी उठाते नहीं हैं

हो के बदनाम और बेहया अब हम
उनसे ताल्लुक़ात अब छुपाते नहीं हैं

बहुत ताब होती है मज़लूम आहों में
किसी लाचार का दिल जलाते नहीं हैं

भेद ऊंच नीच के सरकार ही करे है
घरों मे तो जात पात सिखाते नहीं हैं

बड़े बेताब हैं जो उस्ताद बनाने को
हमें शागिर्द पेशा लोग सुहाते नहीं हैं

तारीख बन के पीढ़ियों तक पलते हैं
दंगे फसाद के दर्द लोग भुलाते नहीं है

शहर के नामचीन लोग हमें जानते हैं
बस अपनी फितरत है, भुनाते नहीं हैं

उधार लेने वालों से लिखा पढ़ी रखो
ना करो तकादा तो ये चुकाते नहीं हैं

देखते हैं अपने बच्चों की जद्दोजहद
कोई तकलीफ मां बाप बताते नहीं हैं

मन्यु आत्रेय

(एक पुलिस अधिकारी)

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