क्या फ़िल्में बढ़ा रही हैं अपराधी मानसिकता? सिनेमा और समाज का गहरा रिश्ता
अपराधीकरण (Criminalization) या अपराधी सोच का समाज में प्रसार केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक, सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी प्रभावित होता है। इस प्रक्रिया में फ़िल्में एक सशक्त माध्यम के रूप में उभरती हैं, जो कभी सकारात्मक भूमिका निभाती हैं तो कभी अनजाने में नकारात्मक प्रभाव भी छोड़ती हैं।
🔴 1. जब अपराध बन जाता है आकर्षण
कई फ़िल्मों में अपराधियों को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो वे समाज के नायक हों।
हिंसा, माफिया जीवन, गैंगवार और हथियारों को शक्ति, स्टाइल और सफलता का प्रतीक बना दिया जाता है।
इसका असर यह होता है कि—
- अपराध “गलत” नहीं बल्कि “स्मार्ट विकल्प” जैसा दिखने लगता है
- कानून से ऊपर होना ताकत का प्रतीक बन जाता है
- युवा वर्ग में जोखिम उठाने की प्रवृत्ति बढ़ती है
यह अपराध के प्रति एक प्रकार का रोमांच पैदा करता है।
🔴 2. अनुकरण की प्रवृत्ति और युवा मन
मनोविज्ञान बताता है कि—
व्यक्ति वही व्यवहार सीखता है, जिसे वह बार-बार सफल होते देखता है।
जब फ़िल्मों में अपराध के बदले—
- पैसा
- सामाजिक रुतबा
- सत्ता
- आकर्षण
मिलता हुआ दिखाया जाता है, तो समाज के कमजोर या असंतुष्ट वर्ग के युवाओं में उसकी नकल करने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
🔴 3. संवेदनशीलता का क्षरण
लगातार हिंसक दृश्य देखने से समाज में एक खतरनाक स्थिति पैदा होती है—
- हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे अपराध “सामान्य” लगने लगते हैं
- पीड़ा और पीड़ित के प्रति सहानुभूति कम होती जाती है
इसे संवेदनहीनता (Desensitization) कहा जाता है, जो अपराधी मानसिकता के लिए उर्वर भूमि बन सकती है।
🟢 4. जब सिनेमा बनता है चेतावनी
हर फ़िल्म अपराध को बढ़ावा नहीं देती।
कई गंभीर और संवेदनशील फ़िल्में—
- अपराध के दुष्परिणाम दिखाती हैं
- अपराधी जीवन की विफलता और अकेलेपन को उजागर करती हैं
- न्याय, कानून और नैतिक मूल्यों को केंद्र में रखती हैं
ऐसी फ़िल्में समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं और आत्म-समीक्षा का अवसर देती हैं।
🟢 5. सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिंब
कई बार फ़िल्में अपराध का महिमामंडन नहीं करतीं, बल्कि—
- गरीबी
- बेरोज़गारी
- सामाजिक अन्याय
- भ्रष्ट व्यवस्था
जैसे कारणों को सामने लाती हैं, जो अपराध को जन्म देते हैं।
यह अपराध का समर्थन नहीं, बल्कि उसकी जड़ों को समझने की कोशिश होती है।
⚖️ निष्कर्ष : समस्या फ़िल्म नहीं, प्रस्तुति है
फ़िल्में स्वयं अपराध नहीं फैलातीं, लेकिन—
यदि अपराध को बिना नैतिक संतुलन, बिना परिणाम और बिना जिम्मेदारी के दिखाया जाए,
तो वह अपराधी मानसिकता के अंतरण में उत्प्रेरक (Catalyst) बन सकती है।
समाधान क्या है?
- जिम्मेदार कहानी-कथन
- अपराध के यथार्थ परिणामों का स्पष्ट चित्रण
- दर्शकों में मीडिया साक्षरता (Media Literacy)
जब सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाता है, तभी वह समाज के लिए सकारात्मक शक्ति बनता है।
