अवकाश माँगूँगा नहीं ॥
विश्वभर की संपदा का मैं कभी मोहताज नहीं
धनाढ्यों में गिना जाऊँ ऐसी मेरी चाह नहीं
जटा सा सहारा बनकर शाखाओं को सँवार सकूँ
आँधी तूफान में रहूँ अडिग मजबूती से पग जमा सकूँ
निराशा का त्याग कर, कर जाऊँ कुछ ऐसा प्रयास
घोर अंधकार में धरातल पर चमके प्रकाश
कर्तव्य की राह पर चलता रहूँ विश्राम चाहूँगा नहीं ।
अवकाश माँगूँगा नहीं ॥
सपनों की शृंखला को रखा है तह जमाकर
उम्मीदों का महल खड़ा है कल्पना में सजाकर
झोपड़ी में रहता हूँ आकाश तक उड़ान है
जिंदगी की राह में तूफान ही तूफान है
निश्चित समय पर मृत्यु की घड़ी आ जायेगी
साँसे उपहार की है शनैः-शनैः रीत जायेगी
तनमन से जुटना होगा हार मानूँगा नहीं
अवकाश माँगूँगा नहीं ॥
ध्वंसावशेष ही सही घनघोर मातम ही सही
कराहता जीवन मेरा कर्तव्य भी पीड़ा भरी
अगम्य है जीवन उपकार माँगूँगा नहीं
अपयश से रहा दूर मैं अपकर्ष चाहूँगा नहीं
आयु के हर मोड़ पर संघर्ष त्यागूँगा नहीं अवकाश माँगूँगा नहीं॥
तुम्हारा प्रयास भी मेरे लिये वरदान साबित हो
तुम्हारा स्नेह भी मेरे लिये अभिमान साबित हो
डूबकर सागर में निकल जाऊँ हंस के जैसे
भीगने ना पाऊँ कुकर्मों से निर्मल रहूँ परमहंस के जैसे
अभिमन्यु की भांति निकल पड़ूँ कर्तव्य के पथ पर
क्षत-विक्षत हो जाऊँ लहू से लथपथ होकर
काल से भी लड़ता रहूँगा पीठ दिखाऊँगा नहीं
रणछोड़ कहलाऊँगा नहीं ॥
— स्वरचित,
प्रकाश सोनकर
रायपुर (छत्तीसगढ़ )
