एक पुलिस अधिकारी की कलम से
बेवजह नुमाइश ए हथियार नहीं करता
ये भी नहीं है कि उनमें धार नहीं करता
लड़ने भिड़ने से मुझे गुरेज़ तो नहीं कोई
मैं उसूलन मगर पहला वार नहीं करता
कई कई रोज़ वो खोज ख़बर नहीं लेता
अब साफ है वो मुझसे प्यार नहीं करता
उसे पाना जीने मरने का सवाल बन जाए
इतना तो मै सर पर सवार नहीं करता
घर लौटते हुए वो बहुत उदास हो जाता है
जिसका घर पर कोई इंतेज़ार नहीं करता
नजरें न मिलाना हिचक नहीं शराफ़त है
मेरा बेटा हर एक से आंखें चार नहीं करता
मैने सीखा है जरूरतें कम से कम रखना
मै दुनिया को दिखाने उधार नहीं करता
सूअर तो कीचड़ में लोटेगा, ये जानकर
नीच लोगों से जूतम पैज़ार नहीं करता
मन्यू अत्रेय
(एक कवि हृदय पुलिस अधिकारी)
