महानदी जल विवाद पर हल की आस? ओडिशा-छत्तीसगढ़ के बीच जल संघर्ष सुलझाने को सीएम माझी ने सुझाया समाधान

महानदी जल विवाद को सुलझाने की दिशा में उम्मीद की किरण नजर आई है। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन माझी ने छत्तीसगढ़ के साथ जल संघर्ष को सुलझाने के लिए समाधान का प्रस्ताव दिया है, जिससे दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से जारी टकराव खत्म होने की संभावना है।

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भुवनेश्वर – ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने राज्य सचिवालय में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान यह स्पष्ट किया कि महानदी जल विवाद का समाधान केवल आपसी सहमति और सौहार्द्रपूर्ण बातचीत से ही संभव है। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस प्रक्रिया में मध्यस्थता की भूमिका निभाए, जिससे दोनों राज्यों के बीच जारी वर्षों पुराना यह जल विवाद समाप्त हो सके।

मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, माझी ने इस बात पर चिंता जताई कि केंद्रीय जल आयोग के ज़रिए जारी प्रक्रिया अत्यंत धीमी है और इसका प्रत्यक्ष प्रभाव विवाद के समाधान पर पड़ रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र अगर एक सक्रिय मध्यस्थ के रूप में पहल करे, तो ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच प्रत्यक्ष संवाद के ज़रिए इस मुद्दे को सुलझाया जा सकता है।

सीएम माझी का मानना है कि जल आयोग तकनीकी मार्गदर्शन देकर विवाद निपटाने में सहयोग कर सकता है, जिससे दोनों राज्यों के रिश्तों में सुधार होगा और भविष्य के लिए स्थायी समाधान निकलेगा।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल के महीनों में जल प्रबंधन से जुड़े कई राष्ट्रीय मंचों पर ओडिशा और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने मिलकर इस मुद्दे को रेखांकित किया था। विशेष रूप से फरवरी में आयोजित ‘ऑल इंडिया स्टेट वॉटर रिसोर्सेज मिनिस्टर्स कॉन्फ्रेंस’ और मार्च में ‘विश्व जल दिवस’ पर दोनों राज्यों के बीच चर्चा हुई थी।

बैठक में ओडिशा के महाधिवक्ता पितांबर आचार्य, मुख्य सचिव मनोज आहूजा और जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल रहे। सूत्रों के अनुसार, दोनों राज्यों के प्रशासनिक अधिकारियों के बीच संवाद पहले से जारी है, और यह विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुँचता दिखाई दे रहा है।

महानदी जल विवाद का कानूनी परिपेक्ष्य

महानदी नदी से जुड़े अंतर्राज्यीय जल विवाद को इंटर-स्टेट रिवर वाटर डिस्प्यूट्स एक्ट, 1956 के अंतर्गत देखा जाता है। इस कानून के अनुसार, केंद्र सरकार आवश्यकता पड़ने पर एक न्यायाधिकरण का गठन कर सकती है, जिसमें एक अध्यक्ष और दो न्यायिक सदस्य शामिल होते हैं। इस न्यायाधिकरण को तीन वर्षों के भीतर अपना फैसला सुनाना होता है, जिसे विशेष परिस्थितियों में दो साल और बढ़ाया जा सकता है।

2017 का विधेयक: स्थायी अधिकरण का प्रस्ताव

अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक 2017 में यह प्रस्ताव रखा गया कि हर विवाद के लिए अलग-अलग ट्रिब्यूनल की बजाय एक स्थायी अधिकरण का गठन किया जाए। इस अधिकरण में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और अधिकतम छह सदस्य होंगे, साथ ही तकनीकी विशेषज्ञों की टीम भी होगी। अधिकरण द्वारा दिया गया फैसला अंतिम माना जाएगा और वह सभी संबंधित राज्यों के लिए बाध्यकारी होगा।

संविधान में क्या है व्यवस्था?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 विशेष रूप से अंतर्राज्यीय जल विवादों से जुड़ा हुआ है। इसके तहत संसद को ऐसे विवादों के निपटारे के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है और इस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को इन मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं है। इसी आधार पर 1956 का अधिनियम बनाया गया।

महानदी की भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताएं

महानदी को छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जीवनरेखा माना जाता है। इसका उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले स्थित सिहावा पहाड़ियों से होता है। यहाँ से निकलकर यह राजिम, सिरपुर, और शिवरीनारायण होते हुए ओडिशा में प्रवेश करती है। संभलपुर, बलांगीर और कटक जिलों से बहते हुए यह बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।

इस नदी पर हीराकुंड, रुद्री, और गंगरेल जैसे प्रमुख बांध निर्मित हैं। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं – पैरी, सोंदूर, शिवनाथ, हंसदेव, अरपा, जोंक और तेल। महानदी के तट पर बसे प्रमुख नगरों में धमतरी, कांकेर, आरंग, राजिम और चंपारण शामिल हैं।

निष्कर्ष:
मुख्यमंत्री माझी की पहल और दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सकारात्मक मंशा इस लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की दिशा में एक नई उम्मीद जगाती है। केंद्र की मध्यस्थता और तकनीकी सहायता इस विवाद के स्थायी समाधान में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

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