कोरबा में करोड़ों का भ्रष्टाचार, 2 साल से फाइलें गायब

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कोरबा, 16 अगस्त 2025। छत्तीसगढ़ में “जीरो टॉलरेंस” की नीति का दावा करने वाली सरकार के दावों पर सवाल उठाने वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कोरबा जिले के आदिवासी विकास विभाग में करोड़ों रुपये की गड़बड़ी के बाद उससे जुड़े अहम दस्तावेज पिछले दो साल से गायब हैं, लेकिन अब तक इस संबंध में पुलिस में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। केंद्र से जब रिपोर्ट मांगी गई, तब जाकर आनन-फानन में कुछ ठेकेदारों और डाटा एंट्री ऑपरेटर पर कार्रवाई की गई, मगर अफसरों के खिलाफ कार्रवाई अब भी अधर में लटकी हुई है।

करीब चार करोड़ रुपये के छात्रावास मरम्मत और नवीनीकरण के लिए विभाग ने 34 काम सिर्फ चार पसंदीदा फर्मों को सौंपे थे। जांच में सामने आया कि अधिकांश जगहों पर महज खानापूर्ति कर दी गई और पेंटिंग या छोटे-मोटे काम दिखाकर पूरा भुगतान कर दिया गया। इतना ही नहीं, इस खेल में शामिल अधिकारियों ने अपने सहयोगियों की मदद से इन सभी 34 कार्यों से संबंधित मूल दस्तावेजों को ही गायब करा दिया, ताकि कोई ठोस सबूत न बच सके।

इस मामले की शिकायत जब प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंची, तो तत्कालीन कलेक्टर संजीव कुमार झा ने जांच टीम गठित की थी। लेकिन उनके तबादले के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया और विभागीय स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इस दौरान तत्कालीन सहायक आयुक्त माया वारियर का भी तबादला हो गया। नतीजतन, भ्रष्टाचार की फाइलें और उससे जुड़े सबूत गायब होते रहे।

वर्ष 2021-22 में संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत केंद्र सरकार ने विभाग को करीब छह करोड़ रुपये आवंटित किए थे। आरोप है कि तत्कालीन सहायक आयुक्त माया वारियर और अधीनस्थ अफसरों ने इस राशि में गड़बड़ी की। मौजूदा कलेक्टर अजीत वसंत ने जांच कराई, जिसमें यह तथ्य सामने आया कि निविदा अभिलेख, स्वीकृतियां, भुगतान से जुड़े सारे मूल दस्तावेज कार्यालय से गायब हैं। इतना ही नहीं, करीब 80 लाख रुपये का भुगतान बिना काम कराए ही कर दिया गया और 48 लाख के चार काम आज तक शुरू ही नहीं हुए।

जांच रिपोर्ट के बाद डाटा एंट्री ऑपरेटर और कुछ फर्मों पर एफआईआर दर्ज कराई गई है, वहीं भ्रष्टाचार में शामिल अफसरों के खिलाफ सचिव को कानूनी कार्रवाई के लिए पत्र लिखा गया है। हालांकि बड़ा सवाल यह है कि जब जांच में साफ हो चुका है कि महत्वपूर्ण दस्तावेज कार्यालय से ही गायब हुए, तो जिम्मेदार लिपिक और अन्य स्टाफ पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिरकार अधिकारी पुलिस में FIR दर्ज कराने से क्यों बच रहे हैं—क्या यह अपने ही लोगों को बचाने की कोशिश है या फिर पूरा मामला दबाने की? यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है।

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