पुलिस रिमांड और न्यायिक रिमांड में क्या अंतर? जानिए गिरफ्तारी के बाद आरोपी को कब भेजा जाता है थाने और कब जेल

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अपराध से जुड़े मामलों में अक्सर “रिमांड” शब्द सुनने को मिलता है, लेकिन बहुत से लोगों को यह पता नहीं होता कि आखिर रिमांड क्या होती है और इसके कितने प्रकार होते हैं। भारतीय न्याय प्रणाली में रिमांड का सीधा संबंध किसी आरोपी की गिरफ्तारी के बाद की कानूनी प्रक्रिया से होता है।

कानून के अनुसार जब पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है, तो उसे 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होता है। यदि पुलिस की जांच 24 घंटे में पूरी नहीं हो पाती, तो पुलिस अदालत से आरोपी को हिरासत में रखने की अनुमति मांगती है। अदालत द्वारा दी गई इसी अनुमति को रिमांड कहा जाता है।

रिमांड के दो प्रमुख प्रकार

1. पुलिस रिमांड (Police Custody)

जब अदालत आरोपी को पूछताछ और जांच के लिए दोबारा पुलिस की हिरासत में भेजती है, तो इसे पुलिस रिमांड कहा जाता है।

मुख्य उद्देश्य:

  • अपराध से जुड़ी जानकारी जुटाना
  • हथियार या चोरी का सामान बरामद करना
  • अन्य आरोपियों तक पहुंचना
  • साक्ष्य एकत्र करना

पुलिस किसी व्यक्ति को अपनी मर्जी से थाने में नहीं रख सकती। इसके लिए मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी होता है। पुलिस रिमांड सामान्यतः गिरफ्तारी के शुरुआती 15 दिनों के भीतर ही दी जा सकती है।

2. न्यायिक रिमांड (Judicial Custody)

जब अदालत आरोपी को पुलिस के बजाय सीधे जेल भेज देती है, तो उसे न्यायिक रिमांड कहा जाता है।

मुख्य उद्देश्य:

  • आरोपी को सुरक्षित रखना
  • साक्ष्यों और गवाहों को प्रभावित होने से बचाना
  • न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखना

न्यायिक रिमांड के दौरान पुलिस आरोपी से सीधे पूछताछ नहीं कर सकती। यदि पूछताछ करनी हो तो अदालत से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।

नए कानून BNSS में रिमांड का प्रावधान

पहले रिमांड से जुड़े नियम CrPC की धारा 167 के अंतर्गत आते थे। अब नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187 के तहत रिमांड की प्रक्रिया संचालित की जाती है।

रिमांड की अधिकतम अवधि और डिफॉल्ट बेल

  • प्रारंभिक पुलिस रिमांड: अधिकतम 15 दिन
  • सामान्य अपराधों में चार्जशीट दाखिल करने की समय सीमा: 60 दिन
  • गंभीर अपराधों (हत्या, दुष्कर्म आदि) में: 90 दिन

यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर पुलिस चार्जशीट पेश नहीं कर पाती, तो आरोपी को कानून के तहत डिफॉल्ट बेल (Default Bail) का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

आसान उदाहरण से समझिए

मान लीजिए किसी व्यक्ति को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

पुलिस रिमांड:
पुलिस को आरोपी से पूछताछ करनी है और चोरी का सामान बरामद करना है। ऐसे में अदालत से पुलिस रिमांड मांगी जाएगी ताकि आरोपी को थाने में रखकर पूछताछ की जा सके।

न्यायिक रिमांड:
जब पूछताछ पूरी हो जाती है और मामला अदालत में विचाराधीन होता है, तब आरोपी को जेल भेज दिया जाता है। इसे न्यायिक रिमांड कहा जाता है। आरोपी जेल में तब तक रह सकता है जब तक उसे जमानत न मिल जाए या मुकदमे का फैसला न आ जाए।

रिमांड की यह प्रक्रिया जांच एजेंसियों को अपराध की निष्पक्ष जांच करने का अवसर देती है, वहीं अदालत की निगरानी आरोपी के कानूनी अधिकारों की भी रक्षा करती है।

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