जब हार नहीं मानी पृथिका याशिनी ने! कानूनी लड़ाई जीतकर बनीं भारत की पहली ट्रांसजेंडर पुलिस अधिकारी
भारत में समान अधिकार और सामाजिक बदलाव की दिशा में एक ऐतिहासिक अध्याय तब लिखा गया, जब के. पृथिका याशिनी देश की पहली ट्रांसजेंडर पुलिस अधिकारी बनीं। उन्होंने वर्ष 2017 में तमिलनाडु पुलिस में सब-इंस्पेक्टर (SI) के रूप में कार्यभार संभालकर न केवल इतिहास रचा, बल्कि हजारों ट्रांसजेंडर लोगों के लिए नई उम्मीद भी जगाई।

तमिलनाडु के सलेम जिले में जन्मी K. Prithika Yashini ने कंप्यूटर एप्लीकेशन में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पुलिस सेवा में जाने का सपना देखा था। हालांकि उनका यह सफर आसान नहीं था। जब उन्होंने तमिलनाडु पुलिस भर्ती बोर्ड में आवेदन किया, तो भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडर श्रेणी का विकल्प नहीं होने के कारण उनका आवेदन स्वीकार नहीं किया गया।
अपने सपने को टूटने देने के बजाय पृथिका याशिनी ने कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना। उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर कर भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडर समुदाय को शामिल करने की मांग की। यह मामला केवल एक व्यक्ति की नौकरी का नहीं, बल्कि समान अवसर और अधिकारों की लड़ाई बन गया।
मद्रास हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पुलिस भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडर श्रेणी को शामिल करने का निर्देश दिया। अदालत के इस फैसले ने न केवल पृथिका याशिनी के लिए रास्ता खोला, बल्कि देशभर में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश भी दिया।
कड़ी मेहनत और प्रशिक्षण के बाद अप्रैल 2017 में पृथिका याशिनी ने तमिलनाडु पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के रूप में अपनी जिम्मेदारी संभाली। उनकी पहली पोस्टिंग धरमपुरी जिले में हुई, जहां उन्होंने वर्दी पहनकर सेवा शुरू की और देश की पहली ट्रांसजेंडर पुलिस अधिकारी बनने का गौरव हासिल किया।
पृथिका याशिनी की कहानी संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है। उन्होंने साबित किया कि सामाजिक चुनौतियां और भेदभाव किसी व्यक्ति के सपनों को नहीं रोक सकते। आज उनकी उपलब्धि देशभर के युवाओं और विशेष रूप से ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
