एशियन गेम्स 2026 में भारत का दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
हॉकी की दोहरी स्वर्णिम सफलता ने मन गर्व से भर दिया। आइची-नागोया एशियाई खेलों से भारत के लिए सबसे सुखद और ऐतिहासिक समाचार भारतीय हॉकी का दोहरा स्वर्ण है। पुरुष टीम ने मलेशिया को 5-1 से हराकर अपना खिताब बरकरार रखा और महिला टीम ने चीन को 1-0 से हराकर 44 वर्ष बाद एशियाई खेलों का स्वर्ण हासिल किया। दोनों टीमों ने लॉस एंजिल्स 2028 ओलंपिक के लिए सीधे क्वालीफाई भी किया। एक भारतीय खेल प्रशासक के रूप में मेरे लिए यह उपलब्धि विशेष संतोष का विषय है। मैंने खेल प्रशासन को बहुत करीब से देखा है और मेरा अनुभव है कि किसी टीम की सफलता केवल मैदान पर दिखाई देने वाले खिलाड़ियों की सफलता नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की प्रतिभा पहचान, कोचिंग, फिटनेस, प्रशासनिक सहयोग, खेल विज्ञान और सबसे बढ़कर एक मजबूत टीम संस्कृति होती है। भारतीय हॉकी की यह सफलता उसी सामूहिक प्रयास का परिणाम है। पुरुष और महिला दोनों टीमों का एक ही एशियाई खेल में स्वर्ण जीतना भारतीय हॉकी के इतिहास का यादगार अध्याय है। विशेष रूप से महिला टीम का 44 वर्ष बाद स्वर्ण जीतना आने वाली पीढ़ियों की लड़कियों के लिए बहुत बड़ा संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत की बेटियां किसी भी ऊंचाई तक पहुंच सकती हैं।
85 पदक-गर्व का विषय, लेकिन आत्मसंतोष का नहीं : भारत ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य सहित कुल 85 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। कुल पदकों की दृष्टि से यह हांगझोउ 2023 के 106 पदकों के बाद भारत का दूसरा सर्वश्रेष्ठ एशियाई खेल प्रदर्शन है। मेरी दृष्टि में 85 पदकों को केवल हांगझोउ के 106 पदकों से तुलना करके कमतर आंकना उचित नहीं होगा। अलग-अलग एशियाई खेलों में स्पर्धाओं की संख्या, प्रतिस्पर्धा और परिस्थितियां बदलती हैं। लेकिन 22 पदकों की कमी और स्वर्ण पदकों का 28 से घटकर 21 होना एक गंभीर संकेत जरूर है। मैं इसे असफलता नहीं मानता, लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए। यही वह बिंदु है जहाँ उपलब्धि के साथ आत्ममंथन जरूरी हो जाता है।
मेरी नजर में इस एशियाड की सबसे बड़ी सकारात्मक बात – पदकों का फैलाव : इस बार भारत ने हॉकी, क्रिकेट, कबड्डी, तीरंदाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, निशानेबाजी, गोल्फ और एथलेटिक्स जैसे अनेक खेलों में अपनी ताकत दिखाई। महिला गोल्फ में प्रणवी उर्स का स्वर्ण, तीरंदाजी में कुमकुम मोहोद का स्वर्ण और विभिन्न टीम खेलों की सफलता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। युवा खिलाड़ियों का प्रदर्शन मुझे सबसे अधिक आश्वस्त करता है। किसी भी देश की खेल शक्ति का वास्तविक आकलन केवल वर्तमान पदकों से नहीं, बल्कि इस बात से होता है कि उसके पास अगली पीढ़ी के कितने खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं। कुमकुम जैसी युवा प्रतिभाएं मेरे लिए केवल आज का पदक नहीं हैं। वे 2032 और 2036 के भारत की संभावित ओलंपिक शक्ति का संकेत हैं।
हांगझोउ के 106 से 85 तक – सवाल कठिन है, लेकिन पूछना जरूरी है : हांगझोउ में भारत ने 106 पदक जीते थे और नागोया में 85। इस अंतर के कई कारण हो सकते हैं। हर संस्करण में खेलों और स्पर्धाओं की संरचना बदलती है, विभिन्न देशों की तैयारी अलग होती है और पदक की प्रतिस्पर्धा भी बदलती रहती है। फिर भी एक पूर्व खेल प्रशासक के रूप में मैं मानता हूं कि 22 पदकों का अंतर हमें कुछ कठिन सवाल पूछने के लिए बाध्य करता है। क्या हमारी पदक रणनीति अभी भी कुछ चुनिंदा खेलों पर बहुत अधिक निर्भर है? क्या हम अधिक पदक अवसर वाले खेलों में पर्याप्त निवेश कर रहे हैं? क्या जूनियर खिलाड़ियों को सीनियर स्तर तक पहुंचने के लिए पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय अनुभव मिल रहा है? और क्या हमारे रजत तथा कांस्य पदकों को भविष्य में अधिक स्वर्ण में बदला जा सकता है? इन सवालों के जवाब किसी खिलाड़ी को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए खोजे जाने चाहिए।
भारत और एशिया की शीर्ष शक्तियां- अब अंतर कम करना होगा : चीन 341, जापान 269 और दक्षिण कोरिया 150 पदकों के साथ भारत से आगे रहे, जबकि भारत 85 पदकों के साथ चौथे स्थान पर रहा। चौथा स्थान सम्मानजनक है, लेकिन मेरे विचार से भारत जैसे विशाल प्रतिभा आधार वाले देश के लिए यह अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। दक्षिण कोरिया से 65 पदकों का अंतर हमें बताता है कि केवल कुछ खेलों में मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। हमें ऐसे खेलों में भी दीर्घकालीन निवेश करना होगा जिनमें पदकों की संख्या अधिक है – जैसे तैराकी, जिम्नास्टिक्स, साइक्लिंग, रोइंग, फेंसिंग और अन्य तकनीकी खेल। मेरी स्पष्ट राय है कि अब ‘टॉप-4 में बने रहना’ लक्ष्य नहीं होना चाहिए। टॉप-3 में स्थायी स्थान बनाना भारत का रणनीतिक लक्ष्य होना चाहिए।
मेरा व्यक्तिगत निष्कर्ष : मैं इस एशियाड के परिणाम को न तो असफलता मानता हूं और न ही अंतिम सफलता। मेरे लिए यह एक महत्वपूर्ण संक्रमण-बिंदु है। एक ओर 85 पदक और चौथा स्थान भारतीय खेलों की बढ़ती ताकत का प्रमाण है। दूसरी ओर हांगझोउ के 106 से 85 तक आना और शीर्ष तीन एशियाई शक्तियों से हमारा अंतर यह बताता है कि हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है। मुझे सबसे अधिक भरोसा हमारे खिलाड़ियों की क्षमता पर है। मेरी चिंता खिलाड़ियों की प्रतिभा को लेकर नहीं, बल्कि उस प्रतिभा के आसपास खड़ी व्यवस्था की निरंतरता को लेकर है। हमारे खिलाड़ियों को केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि ‘और मेहनत करो’। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें बेहतर कोच, बेहतर प्रतियोगिता, बेहतर खेल-विज्ञान, बेहतर चिकित्सा सहायता, बेहतर मानसिक तैयारी और पारदर्शी खेल प्रशासन मिले। यदि हम यह कर सकें, तो 85 पदकों को अगली बार 100 से आगे ले जाना असंभव लक्ष्य नहीं है। लेकिन मेरा बड़ा लक्ष्य केवल पदक संख्या नहीं है। मेरा लक्ष्य यह देखना है कि भारत ऐसी खेल व्यवस्था खड़ी करे जो हर एशियाड और हर ओलंपिक चक्र में नई प्रतिभाओं को तैयार करती रहे।
राजीव श्रीवास्तव
पूर्व आईपीएस,
पूर्व एवं प्रथम खेल आयुक्त छत्तीसगढ़
